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‘‘…. कौंसिल में जाने के बाद उन्होंने वकालत भी छोड़ दी थी और कहा करते थे कि जिस मकान में वे रहते हें, उसी में छोटे-छोटे कमरे बनवाकर हमलोग भी जीवन भर सेवा व्रत लेकर रहा करें। उस विचार का प्रभाव हमलोगों पर पड़ता ही था और जब हमलोगों ने भी वकालत छोड़ दी तब हमलोग उनके आदर्श के बहुत निकट पहुॅंचे हुए समझे जाने लगे । उन्होंने भी हाईकोर्ट जाना बन्द कर दिया, तब हमलोगों के हृदय में उनके प्रति आदर और सम्मान का भाव अधिक हो गया ….

मेरे संस्मरण